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6. Critique of the Author Function in Hindi

Critique of the Author Function


New Criticism के Introduction Series का यह छठा तथा अंतिम भाग है. इसके बाद हम New Criticism पर चर्चा की शुरुआत Hermeneutics से करेंगे. मुझे पूरी उम्मीद है कि आप इस पूरे series को enjoy तो करेंगे ही, साथ ही साथ कुछ हिन्दी भी सीख कर जायेंगे, जो कि आज विश्व-पटल पर अपने आप में एक काफ़ी महत्त्व की भाषा बन चुकी है. !

Read in a sequence for a better understanding —

Literary Theory and Criticism — Introduction (Part- 1)

Literary Theory and Criticism — Introduction (Part- 2)

Literary Theory and Criticism — Introduction (Part -3)

Literary Theory and Criticism — Introduction (Part -4)

Literary Theory and Criticism — Introduction (Part -5)

पिछले लेख संरचनावाद (Structuralism) में मिशेल फूको (Michel Foucault) द्वारा एक लेखक की व्यक्तिपरक चेतना (subjective consciousness) तथा उसकी आधिकारिक आवाज़ (authoritative voice) पर काफ़ी प्रहार किये गये थे, इसलिये कुछ लोगों को लगा, कि अब समय लेखक के बचाव में कुछ कहने का आ गया है. और इसलिये, अपनी प्रस्तावना के साथ आगे आये …..डॉ सैम्यूअल जॉनसन (Dr Samuel Johnson)! (मुझे पता है कि हममें से काफ़ी लोग आक्रोश में थे, और चाहते थे कि किसी मंच पर खड़े होकर, लेखक के बचाव में अपने जोश से भरे उद्गार प्रकट कर सकें. लेकिन अब, इसकी ज़रूरत नहीं है, क्योंकि, हम सबके लिये डॉ सैम्यूअल जॉन्सन (Dr Samual Johnson) काफ़ी अधिकारपूर्ण तरीक़े से यहाँ बोलने वाले हैं). 

सैम्यूअल जॉनसन (Samuel Johnson)

सैमुअल जॉनसन (Dr Samual Johnson) अपने “प्रीफ़ेस टू शेक्सपीयर (Preface to Shakespeare)” में कहते हैं कि ऐसा क्यों है कि हमने हमेशा लेखक के अधिकार को एक घेरे में रखा है? यह महज़ एक प्रश्न नहीं है, जैसा कि स्पष्ट रूप से मिशेल फूको (Michel Foucault) तथा रोलां बार्थ (Roland Barthes) अबतक सुझाते रहे हैं, कि एक लेखक की आवाज़ को अधिकृत तौर पर ना लिया जाये (मानो वह लेखक ना होकर एक पुलिसकर्मी हो, जिसके हाथ में व्यवस्था स्थापित करने हेतु, हमेशा एक डंडा रहता हो?) यहाँ प्रश्न एक मनुष्य की स्वतन्त्र चेतना का है. जिसे हम मानव की आत्मा पुकारते हैं, उसकी पुष्टि करने का है.

डॉ सैम्यूअल जॉनसन (Dr Samual Johnson) कहते हैं: मानव द्वारा किये गये कार्यों (human works) के लिये उसकी क्षमतायें (human abilities) हमेशा एक मूक संदर्भ (silent reference) रही है, और लोगों में हमेशा इस बात को लेकर उत्सुकता रही है, कि मनुष्य अपनी योजनाओं (designs) को कितना विस्तार दे सकता है या, उसकी प्रकृति द्वारा प्रदत्त मूल शक्तियों की सीमाएँ क्या हो सकती हैं. ये सारे प्रश्न किसी मनुष्य विशेष के दर्जे या ओहदे तक सीमित तक नहीं हैं; बल्कि, उनकी तुलना में कहीं अधिक सम्मानजनक प्रश्न हैं. यह किसी मानव मस्तिष्क में निहित जिज्ञासा (curiosity) ही होती है, जो हमेशा उपकरणों (tools) की खोज में होने के साथ-साथ किसी कारीगरी (workmanship) की शिनाख़्त भी करती है, यह जानने के लिये कि उसमें मूल क्षमताओं को कितना श्रेय देना है, और कितना अकस्मिकता को.

तो डॉ सैम्यूअल जॉनसन, जो यहाँ कह रहे हैं, वह यह है: “ठीक है, एक पाठ्य क्षेत्र (textual field) में समाहित शब्दों की कारीगरी (workmanship) पर विचार करना एक अच्छी बात है; लेकिन साथ ही, हम यहाँ इस दुनिया में खुद को भी अपने मूल्यों और क्षमताओं का भरोसा दिलाना चाहते हैं.”

हम कहना चाहते हैं — "भगवान के लिये! यह रचना किसी मशीन द्वारा नहीं बनायी गयी है! वह केवल प्रकार्यों (functions) या चर राशियों (variables) का एक सेट नहीं है - जैसा कि हम किसी प्रयोगशाला में बनाते हैं. यह एक अपने आप में विशिष्ट मानव दिमाग़ की रचनात्मकता (creativity) की उपज है। लेखन एक ऐसी चीज़ है जो मानवीय क्षमताओं (human abilities) को एक विशिष्ट दर्जा देती है. "

ऑथर तथा अथॉरिटी (Author and Authority)

लेकिन, आपको याद दिला दूँ, यह अलग समय हैं — यह है 1969! बौद्धिक विद्रोहों का साल ! इसलिये, मिशेल फूको (Michel Foucault) तथा रोलां बार्थ (Roland Barthes) दोनो ही के लिये, किसी लेखक की अधिकार भरी कोई आवाज़ एक पुलिसकर्मी के डंडे के समान ही है, जो यह बताता है कि किसी पाठ को किस तरह से पढ़ा जाये. दूसरे शब्दों में, दोनों इस बात पर जोर देते हैं कि, लेखक को किसी पाठ में टंकित शब्दों की बुनावट में ढूँढने के विपरीत, उससे किसी पाठ के अर्थ के लिये अपील करना — अर्थ की विस्तृत संभावनाओं के ऊपर एक प्रकार की सीमा या पुलिसिंग ही है.

इस आशय से रोलां बार्थ (Roland Barthes) के निबन्ध के कुछ हिस्सों को देखते है :

बार्थ कहते हैं, "एक बार लेखक को हटा दिए जाने के बाद, किसी पाठ को समझने का दावा काफी निरर्थक हो जाता है.” वैसे, यहाँ एक बार फिर, बार्थ और फूको के बीच थोड़ी दरार आ गई है। फूको यहाँ “काफी निरर्थक” शब्दों का इस्तेमाल नहीं करेंगे. वे कहेंगे, “ओह, नहीं, हम इसे बिल्कुल समझ सकते हैं, लेकिन ‘लेखक का कार्य (Author Function)’, पाठ को समझने की इस गूढ़ प्रक्रिया के कई पहलुओं में से, सिर्फ एक पहलू है.”

लेकिन बार्थ ने अपने करियर के एक ऐसे चरण में प्रवेश कर लिया है, जहाँ वे वास्तव में सोचते हैं कि संरचनाएं इतनी जटिल हो चुकी हैं, कि उनमें अब कोई संरचना ही नहीं दिखती है. और इसका विखण्डन के सिद्धान्त (Deconstruction theory) के प्रभाव से बहुत कुछ लेना-देना है. (विखण्डन का सिद्धान्त भी अंग्रेज़ी साहित्य के विभिन्न सिद्धान्तों में से एक है, जिसकी हम आगे के लेखों में विस्तृत रूप से चर्चा करेंगे). 

हाँ, तो बार्थ को हम ज़ारी रखते हैं — "एक पाठ को एक लेखक देना, मतलब शब्दों को एक आख़िरी द्योतक (final signified) देना है; इस प्रकार, उस पाठ के विभिन्न सम्भावित अर्थों (possible meanings) पर एक सीमा लागू करना है, और यह लेखन के उद्देश्यों का अंत है. ऐसी अवधारणायें साहित्यिक आलोचना (literary criticism) के क्षेत्र के लिये अनुकूल है. हमें पता है कि आलोचकों ने अपने लिये हमेशा एक महत्त्वपूर्ण कार्य लिया है, और वह है एक लेखक (या, उसके हाइपास्टसिस : समाज, मनोविज्ञान, स्वाधीनता, इतिहास इत्यादि) को किसी कार्य के पीछे जाकर ढूँढना: और जब छिपा हुआ लेखक मिल जाता है, पाठ “समझ” में आ जाता है — तो आलोचक जीत जाता है! दूसरे शब्दों में, एक आलोचक के द्वारा अर्थ की पुलिसिंग सम्पूर्ण हो जाती है. (वैसे ही जैसे उन्नीस सौ साठ के दशक के उत्तरार्ध में हुये विद्रोहों में अक्सर पुलिस की ही जीत हुआ करती थी). 

अर्थ का प्रसार (Expansion of Meaning)

फूको के शब्दों में, अगर हम पाठ के केंद्र में लेखक और उसके आदर्शों को रखते हैं, तो हम भयातुर होकर अर्थ के प्रसार को रोक देते हैं. (यह कथन, उन्नीसवीं सदी के छठे दशक के उत्तरार्ध का, किसी भी प्रकार की सत्ता के ख़िलाफ, एक विद्रोह का ही एक रूप है. आप उस माहौल को इन विचारों के सन्दर्भ में समझ सकते हैं).

अब एक बार फिर यहाँ संशयवाद को लेकर एक संशय पैदा हो गया है. हम उत्तेजित होकर पूछ सकते हैं, "हमें अर्थ के प्रसार से क्यों नहीं डरना चाहिए? हम किसी भी चीज को एक निश्चित तौर पर जानना चाहते हैं. हमें उसके दस करोड़ विभिन्न संभावित अर्थों से क्या लेना-देना? हम यहां यह जानने के लिए हैं कि इतने सारे शब्दों के जाल किस एक अर्थ की ओर इशारा करते हैं. कृपया, हमसे यह न बोला जाये कि हम जीवन भर एक जगह बैठ कर, एक-एक वाक्य का पदभंजन करें. हमें कृपया करके यह तो बिल्कुल ही ना बतायें कि बाल्ज़ाक (Balzac) की लघुकथा में कौन-कौन से जटिल वाक्य हैं. हम यहाँ जानने के लिये हैं कि चीजों का क्या मतलब हो सकता है. अगर यह पुलिसिंग है तो होने दीजिये ना! जो भी हो, हम इस एक अर्थ को फ़ाइनल करते हैं, ठीक है?”

हम अलग-अलग परिस्थितियों में अलग-अलग तरीक़ों से सोंचते हैं, है ना? हम आज व्यापक शब्द-जालों को एक सीमित अर्थ तक संकुचित कर देना कोई बड़ी बात नहीं समझते. हमें बड़ी जल्दी होती है, कि और भी कई महत्त्वपूर्ण कार्य पड़े हैं. लेकिन, आपको फिर से मैं याद दिला दूँ, वह बीसवीं सदी के छठे दशक के उत्तरार्ध का बौद्धिक विद्रोहों का समय था (1969!), जब तमाम प्रोफेसर्स, उनके छात्र, तथा लेखक अपनी स्वतंत्र चेतना के लिये सत्ता से भिड़े थे; और उनका सामना अक्सर “अथॉरिटी” (पुलिस का डंडा) से होता था. बहुत कुछ आपके दिमाग़ की सोंच की संरचना पर भी निर्भर करता है. क्या आप (उस माहौल में), “ऑथर” शब्द को बिना किसी “अथॉरिटी” के द्योतक के रूप के परिकल्पित कर सकते थे? तो, (जैसा कि हमनें “एक लेखक क्या है?” निबन्ध में चर्चा की थी), पेरिस में (वो उस दशक के दुनिया की कोई और भी महत्त्वपूर्ण जगह हों सकती है) जब विश्वविद्यालयों के तमाम प्रोफेसर्स अपने छात्रों के साथ विभिन्न मोर्चों पर डटे थे, और उस समय जब मिशेल फूको ने “What’s an Author” लिखा, उन्हें निश्चय ही वो सन्दर्भ हमसे ज़्यादा समझ में आया होगा.

वहाँ ये तर्क कि हम अर्थ को कैसे सीमित कर सकते हैं, एक अलग भावना में दिये गये हैं. “ऑथर” से अपील का दुरुपयोग बहुत कुछ उस ऐतिहासिक क्षण में समाहित है. यहाँ माहौल इस तरह का है कि “ऑथर” शब्द के उच्चारण के साथ-साथ दिमाग़ में “अथॉरिटी” शब्द कौंधता है. और, आप ही सोंचिए ज़रा, जब हम ख़ुद “अथॉरिटी” शब्द को दिमाग़ में लाते हैं, तो क्या हमारे दिमाग़ में एक बार भी पुलिस की छवि नहीं आती? 

तार्किक विश्लेषण के प्रणेता (Founders of Discursivity)

यह विचारों की एक संरचना (structure) है जो शायद आज तक हम में से कई लोगों के जीवन में व्याप्त है, और हमेशा से ही कई लोगों के जीवन में व्याप्त रही है, लेकिन इस संरचना (ऑथर => अथॉरिटी) का आज हमारी सोच में उतना वर्चस्व (hegemony) नहीं है जितना कि तब था जब ये निबंध फूको (Michel Foucault) एवं बार्थ (Roland Barthes) द्वारा लिखे गये थे. एक और प्रश्न यहाँ भी उठता है, वह यह, कि अगर किसी कार्य के पीछे कोई लेखक नहीं है, तो किसी सिद्धान्त कार्य के पीछे कोई सिद्धांतवादी भी नहीं होना चाहिये. वह अपने नाम के लिये अलग से कैसे सम्मान प्राप्त कर सकता है, जब सबकुछ संरचना में ही समाहित है?

मान लीजिये कि फूको स्वयं कहते हैं कि वे एक लेखक नहीं हैं, लेकिन हो सकता है कि वे मन में कुछ और सोंचते हों (हाँ, मैं ही लेखक हूँ!). देखा जाए तो वास्तविक जीवन में फूको ख़ुद को एक लेखक नहीं मान रहे हैं, लेकिन, वे खुले तौर पर कुछ लेखकों के प्रशंसक भी हैं. वे अपनी पीढ़ी के अन्य लोगों की तरह ही कार्ल मार्क्स (Karl Marx) और सिग्मन्ड फ्रायड (Sigmund Freud) के पीछे पागल हैं. यही एक समस्या है, कि हम व्यक्तिगत तौर पर अगर किसी लेखक से सामंजस्य नहीं बिठा पाते, तो हम उनकी अथॉरिटी को यह कहकर अस्वीकार कर देते हैं कि यह पुलिसिंग है; लेकिन, वही नियम हम अपने पसंदीदा लेखकों पर नहीं लगा पाते. क्या फूको को इन विशेष-दर्जा प्राप्त (privileged) लेखकों को भी फ़्रेम से बाहर नहीं कर देना चाहिये? फूको नीत्शे (Nietzsche) के बारे में यहाँ बोलना भूल जाते हैं, जिनकी On the Genealogy of Morality: A Polemic का प्रभाव उनके स्वयं के कार्यों में परिलक्षित होता है.

हो सकता है कि यह महज़ एक संयोग ही है, कि फूको नीत्शे क नाम लेना यहाँ भूल जाते हैं, महज़ एक संयोग! आपको याद होगा कि पिछले एक लेख में हमने पॉल रिकर की चर्चा की थी, और जिन्होंने लगभग यह घोषणा करते हुये कहा था कि ये त्रिमूर्तियाँ — कार्ल मार्क्स, फ़्रेडरिक नीत्शे, तथा सिग्मंड फ्रायड संशयवाद (Skepticism) की दुनिया के “स्वामी” हैं! और संयोग से यें तीनो ही मिशेल फ्रायड के पसंदीदा लेखक भी हैं. अगर नीत्शे यहाँ, मार्क्स तथा फ्रायड के साथ सम्मिलित होते तो त्रिमूर्ति का स्वामित्व सम्पूर्ण हो जाता. और इस माहौल में “स्वामित्व/अथॉरिटी” आख़िरी शब्द होगा जो मिशेल फूको सुनना चाहेंगे. फिर इस विचार से मिशेल फूको ने कैसे तारतम्य बिठाया होगा? (ज़रा दिमाग़ लगाइये). उन्होंने बेशक़ इस स्थिति से निपटने के लिये एक तरकीब निकाली थी — उन्होंने कहा कि ये त्रिमूर्ति असल में लेखक नहीं है, बल्कि, ये साहित्य में तार्किक विश्लेषण (discursivity) के प्रणेता हैं!

और फिर मिशेल फूको आगे जोड़ते हैं, कि एक तार्किक विश्लेषण के प्रणेता तथा एक विशिष्ट दर्जा-प्राप्त लेखक में फ़र्क करना एक बेइंतेहा मुश्किल काम है. फिर वे गॉथिक नॉवल (gothic novel) का उदाहरण देते हैं, और कहते हैं, कि एन रैडक्लिफ (Anne Radcliffe) इस तरह की रचना-पद्धति में तार्किक विश्लेषण (discursivity) की प्रणेता (founder) थीं. हालाँकि, वे यहाँ एक छोटी सी चूक कर जाते है; क्योंकि, गॉथिक उपन्यासों में तार्किक विश्लेषण के प्रणेता होरेस वॉल्पोल (Horace walpole) को माना जाता है, ना कि एन रैडक्लिफ को (इतनी सी भूल चलती है, आगे बढ़ते है !) वे उदाहरण के तौर पर कहते हैं, कि एन रैडक्लिफ (Anne Radcliffe) ही वह व्यक्ति थीं, जिन्होंने कुछ ऐसे अप्रस्तुत विधान, रूपक, नमूने, अनुकल्प, आधार अथवा नवाचार को विकसित किया, जिसने अगले सौ सालों तक, यहाँ तक कि आज भी, गॉथिक गल्प को लिखने की कला का नियमन किया है. इसलिये, मिशेल फूको (Michel Foucault) स्वीकारते हैं, कि उन्होंने निश्चित तौर पर एक प्रकार के वाचन (a way of talking), लेखन (a way of writing) तथा आख्यान (a way of narrating) के ढंग को स्थापित किया है. लेकिन, फिर भी मिशेल फूको (Michel Foucault) के अनुसार वे एक विशिष्ट व्यक्ति नहीं हैं जिसने एक तरह की प्रोक्ति (discourse) से दुनिया को परिचित कराया, जिसके भीतर ही भीतर कुछ विचार (जिनका किसी व्यक्ति से कोई लेना-देना नहीं) विकसित हो सकते हों! दूसरी ओर, मिशेल फूको (Michel Foucault) अपने पसंदीदा प्रवर्तकों को गैलीलियो (Galileo Galilei) और न्यूटन (Isaac Newton) जैसे वैज्ञानिकों से अलग करने के लिए भी काफ़ी उतावले हैं. वैसे यह दिलचस्प बात है कि हम लेखकों को मार्क्सवादी या फ्रायडियन तो बोल देते हैं, लेकिन, हम लोगों को रैडक्लिफियन या गैलीलियन या न्यूटोनीयन नहीं बोलते हैं. हम "न्यूटोनियन" विशेषण का तो उपयोग करते हैं, लेकिन उन लेखकों के लिये नहीं जो क्वांटम मेकैनिक्स में रुचि रखते हैं.

मिशेल फूको (Michel Foucault), मार्क्स (Karl Marx) तथा फ्रायड (Sigmund Freud) जैसे लेखकों के कार्यों को एक विशिष्ट दर्जा देते हैं, और बहुत सारे लोग उनसे सहमत भी होते हैं. उनके अनुसार ये तार्किक विश्लेषण के क्षेत्र में एक विशेष दर्जा रखते हैं. ये वे लोग हैं जिन्होंने नयी चर्चा की शुरुआत की, नए विचार प्रतिपादित किए, और पहले से उपस्थित विचारों का अनुसरण नहीं किया. लेकिन यह भी सही है कि बहुत से लोग इन दोनो लेखकों को एक तानाशाह की तरह देखते हैं. क्योंकि, यह आज भी कल्पना से परे की बात है, कि इन प्रणेताओं के स्वयं के विचारों की परिधि से बाहर निकलकर उनके विचारों का परीक्षण किया जाए, और इस तरह वे वहाँ अपने विचारों की आधिकारिक तौर पर अध्यक्षता ही कर रहे होते हैं। उनके नाम उनके तर्क के साथ जुड़े हैं, और उनके प्रशंसक इस बात की पैरवी करते नज़र आते हैं कि उन्हें समझने के लिए उनके अपने दृष्टिकोण को ही सर्वोपरि रखा जाए. यह किस तरह से लेखक के व्यक्तित्व को उसके कार्यों से अलग करने जैसा है? यह दृष्टिकोण निश्चित रूप से बहस योग्य है। 

एक लेखक के क़ानूनी अधिकार (Legal Rights of an Author)

ख़ैर, उन विवादों में ना पड़ कर हमें एक निष्कर्ष पर पहुँचना है कि लेखक की अनुपस्थिति के, या उसके एक लेखक के कार्य (Author Function) में विलीन होने के, क्या परिणाम हो सकते हैं. एक परिणाम तो यह है, जैसा कि मिशेल फूको (Michel Foucault) स्वयं कहते हैं, कि एक लेखक का कोई क़ानूनी अधिकार नहीं होता. हमें यहाँ सवाल करना चाहिए, “फिर कॉपीराइट (copyright) क्या होता है ? बौद्धिक सम्पदा (intellectual property) क्या होती है ? कोई भला ऐसा कैसे बोल सकता है?” अच्छा… यहाँ आप एक बौद्धिक सन्दर्भ (intellectual context) देखें:

कॉपीराइट एक बुर्जुआ विचार (bourgeois idea) के रूप में उभरा था। इसका तात्पर्य यह था कि, “मेरे लेखन पर मेरा अधिकार है. मेरा मेरे लेखन के साथ एक स्वामित्व (ownership) का सम्बन्ध है.”

लेखक का ग़ायब होना, बुर्जुआ विचार के (एक प्रकार से) परिणामी तौर पर गायब होने की तरह है. यह वास्तव में कॉपीराइट तथा बौद्धिक संपदा के विचारों की एक प्रकार से ब्रैकेटिंग (समानता के आधार पर दो या अधिक व्‍यक्तियों या वस्‍तुओं को एक ही वर्ग में रखना) है. और इसलिए लेखक के किसी कानूनी अधिकार के नहीं होने के बारे में फूको जो भी कह रहे हैं, उसमें एक सुसंगति (consistency) तो है; लेकिन, शायद, हमारे यहाँ, इसी ख़ास बिंदु पर, अड़ने का समय आ चुका है. हम हार नहीं मानने वाले हैं, क्योंकि, हमें इस लेख में एक लेखक को बचाना है, आपको याद है न? इसका एक मतलब यह भी है कि हमें एक लेखक के अधिकारों के हक़ में बोलना है, क्योंकि, अधिकार ही किसी व्यक्ति या समूह के अस्तित्त्व को प्रमाणित करते हैं.

हमें यहाँ लेखक को क़ानूनी तौर पर एक पहचान दिलानी है, ताकि उसकी आवाज़, तथा उस आवाज़ द्वारा उठाये गये मुद्दों की आधिकारिक तौर पर कहीं कोई सुनवाई हो सके. दूसरे शब्दों में, समाज की किसी गुमी हुयी आवाज़ को एक लेखक के तौर पर सम्मान मिल सके, ताकि नयें तरीक़ों के विचारों तथा सहानुभूतियों की खोज तथा प्रसार को एक आत्मबल मिल सके. उदाहरण के तौर पर, हमारे अपने ही मानव समाज से, क्रूरतापूर्ण तरीक़े से बहिष्कृत कर दिया गया कोई एक हिंजड़ा समुदाय, लेखन के द्वारा अधिकारिक तौर पर अपना दर्द बयाँ कर सके; और गर्व से यह कह सके कि, “हाँ, मैं इंसानों के ही एक समाज क सम्माननीय सदस्य हूँ, जिसे प्रकृति ने बड़े प्यार से रचा है. मैं आम इंसानों जितना ही क़ाबिल हूँ. मैं हिंजड़ा समुदाय से हूँ, और एक लेखक के रूप में आज आपके सामने खड़ा बोल रहा हूँ. मैं अपनी पहचान को खुले तौर पर व्यक्त कर रहा हूँ, क्योंकि, मैं लेखन द्वारा अपनी स्वतंत्रता के लिये लड़ रहा हूँ. मैं कोई पुलिसिंग नहीं कर रहा और ना ही आपकी स्वतंत्रता ही छीन रहा हूँ. मैं अपने लेखन द्वारा इस समाज से अपने इंसानी अधिकारों के लिये आग्रह कर रहा हूँ. मैं चाहता हूँ कि मैं आम मनुष्य की तरह एक सम्माजनक ज़िन्दगी जी सकूँ. मेरे समुदाय के लोग भी आम लोगों की तरह ही पढ़-लिख कर नौकरियाँ पायें और समाज में सम्मानपूर्वक जीवनयापन करें. हाँ, मैं आपके सामने आज गर्व से एक लेखक के रूप में खड़ा हूँ. मैं आपके लेखन की परम्पराओं में विलीन नहीं होना चाहता, क्योंकि, आपकी चर्चाओं में मेरी कोई चर्चा ही नहीं है. नहीं, मैं लेखन का कार्य (Author Function) नहीं हूँ. मैं एक स्वतंत्र तथा स्वायत्त लेखक हूँ. और मैं, अपने इस लेखक के अधिकार द्वारा, आपको याद दिलाना चाहता हूँ, कि मैं स्वयं से बड़ी किसी भी वस्तु का हिस्सा नहीं बनना चाहता, क्योंकि, मैं अलग हूँ. मैं उतना ही स्वतंत्र हूँ, जितनी कि मेरी लेखनी.”

निष्कर्ष (Conclusion)

दूसरे शब्दों में, एक लेखक की पारम्परिक छवि- जो कि साठ के दशक के उत्तरार्ध में मिशेल फूको (Michel Foucault) तथा बार्थ (Roland Barthes) के कार्यों में संदेह के घेरे में हुआ करती थी- उसे हम नये नज़रिये से देख सकते है. इसे नवीन अधिकारों या दबी-कुचली आवाज़ों की स्वतंत्रता के स्रोत के रूप में स्वीकार किया जा सकता है, और पाठक भी लेखकों को उसी प्रकार देख सकते है. 

यह सोचना बहुत मुश्किल है कि मिशेल फूको (Michel Foucault) इस प्रकार के आग्रह पर कैसे प्रतिक्रिया देते, और यह एक ऐसी समस्या है जो साहित्य सिद्धान्त (English Literary Theory) तथा उसके ही एक प्रकार जिसे हम कल्चरल स्टडीज़ (Cultural Studies) कहते हैं — और जिसमें ख़ासकर पहचान की राजनीति (identity politics) के प्रश्न होते हैं — की पढ़ायी के दौरान रह-रह कर हमें परेशान करेगी. और, इस शाखा विशेष के भीतर भी, लोगों के बीच पहचान की राजनीति (identity politics) के प्रश्न पर विचार का विभाजन होगा. उनमें से कुछ, व्यक्ति के पहचान की ऑटॉनमस इंटेग्रिटी (autonomous integrity) तथा वैयक्तिकता (individuality) के पक्षधर होंगे, और कुछ यह कहते पाए जाएँगे कि पहचान एक व्यक्ति-निष्ठ स्थिति (subject position) है, जो सामाजिक आचार-व्यवहार (social practices) के जाल (matrix) द्वारा प्रकट होती है या समझ में आती है. सिद्धान्त के प्रकार के उन रूपों के भीतर भी आंतरिक विभाजन हैं - और हम उन सिद्धांतों के प्रकारों का तो यहाँ उल्लेख ही नहीं कर रहे हैं, जिनका सीधे तौर पर पहचान की राजनीति (identity politics) से कोई लेना-देना नहीं है. 

आगे साहित्य सिद्धान्त की पढ़ायी के दौरान हम ऐसे ही बेहद परेशान करने वाले मुद्दों को देखेंगे. अंग्रेज़ी साहित्य सिद्धान्त (English Literary Theory) के परिचय से सम्बन्धित लेखों की शृंखला यहीं समाप्त होती है. हमने यहाँ सिद्धान्त के काफ़ी पहलुओं पर चर्चा की है जिसपर हम आगे भी बार-बार लौटकर देखते रहेंगे. अगले लेख से हम सिद्धांतों की चर्चा शुरू करेंगे, जिसमें सबसे पहले हम व्याख्याशास्त्र (Hermeneutics) को देखेंगे, और हम यह भी देखेंगे कि हम व्याख्या की प्रकृति (nature of interpretation) के बारे में किन-किन तरीक़ों से सोंच सकते हैं.

 

 

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