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Literature of the Absurd in Hindi

 Literature of the Absurd




अब्सर्डिज़म (Absurdism), अब्सर्ड (absurd) शब्द से आता है, जिसका शाब्दिक अर्थ होता है “हट-के”. वास्तव में, यह लैटिन शब्द अब्सर्डस (absurdus) [ab (deaf) तथा surdus (stupid)] से आया है. और साहित्य तथा रंगमंच की दुनिया में इसका मतलब होता है बेकार, व्यर्थ, हास्यास्पद तथा अप्रासंगिक. अब्सर्ड साहित्य (Absurd literature) 1940 के दशक में यूरोप (Europe) में आया. साहित्य का यह एक सक्रियतवादी अन्दाज़ (activist style) है जिसमें संरचना (structure), प्लॉट (plot), तथा चरित्रिकरण (characterisation) को नज़रंदाज़ करते हैं, और इसमें यह दर्शाया जाता है कि एक व्यक्ति द्वारा किसी परिस्थिति को तर्क द्वारा साधने की कोशिश किस तरह से निहायत बेकार जाती है. इस प्रकार की रचनाओं में एक विरोधाभास को प्रस्तुत करते हैं. यहाँ यह ज़ोर दिया जाता है कि प्रकृति में कोई तर्कप्रियता नहीं है, तथा आदमी इस ब्रह्मांड में निहायत अकेला और लाचार है.


सरल शब्दों में, वह साहित्य, जो पारम्परिक प्लॉट की संरचना (plot structure) का इस्तेमाल नहीं करता, और जहाँ लेखक किसी मानदण्ड को नहीं अपनाते वही अब्सर्ड (Absurd) है. अब्सर्ड दर्शन (Absurd philosophy) में अब्सर्ड (absurd) की स्थिति, एक व्यक्ति के अर्थ की तलाश तथा ब्रह्माण्ड की अपार अर्थहीनता के बीच मूलभूत असमंजस (disharmony) की अवस्था से आती है, जहाँ हमेशा एक द्वन्द विद्यमान रहता है. यहाँ एक व्यक्ति अपने जीवन में प्रयोजन (reason) की तलाश में होता है, जो कि उसके मानवीय विवशता (limited constraints) के चलते व्यक्त नहीं हो पाता. यानि कि, एक व्यक्ति अपने जीवन के अर्थ को पूरी तरह से जान नहीं पाता. अब्सर्ड साहित्य (Absurd Literature) से सम्बद्ध कुछ महत्त्वपूर्ण लेखकों के नाम हैं:


Samuel Beckett

Jean Genet

Arthur Adamov

Harold Pinter

Tom Stoppard

Joseph Heller

John Irving

Gunter Grass
Stanley Kubrick

Vaclav Havel


(तथा और भी कई नाटककार)



Theatre of the Absurd

अबतक हम अब्सर्डिज़म (Absurdism) शब्द का मतलब लगभग-लगभग जान चुके हैं. अब हम इससे ही सम्बन्धित एक पारिभाषिक पद (term/phrase), थीयटर औफ़ द अब्सर्ड (Theatre of the Absurd) को जानेंगे. इस पद (phrase) क उपयोग अब्सर्डिज़म (Absurdism) के दर्शन को बताने के लिये (interchangeably) होता है. यह अब्सर्डिज़म (Absurdism) का सबसे ख़ास संगत पारिभाषिक पद (companion term) है. 

पश्चिमी युरपीयन (Western European) तथा अमेरिकी (American) नाटककारों के एक समूह द्वारा, 1950 तथा 1960 के दशक के उत्तरार्ध में जो नाटक रचे गये, उसके लिये आलोचक Martin Esslin ने थीयटर औफ़ द अब्सर्ड (Theatre of the Absurd) जैसा पारिभाषिक पद गढ़ा. उन्होंने अपनी शिनाख़्त में यह पाया कि इस नयी शैली के नाटकों में कई लक्षण समान है. जब हम शैली (style) की बात यहाँ करते हैं, तो इसका मतलब यही होता है कि ऐसी शैली जिसमें कुछ भी स्थिर नहीं है, जहाँ कोई मानदण्ड या नियम नहीं है. यही अब्सर्ड (Absurd) की शैली है. यहाँ नाटकीय परम्पराओं (theatrical conventions) को लेकर कोई अनुपालन (adherence) नहीं होता. यहाँ जो दर्शक अपेक्षा करते हैं वैसा कुछ भी नहीं होता. नाटक के इतिहास में यह एक सकारात्मक कदम (positive development) था, भले ही यह थोड़ा अनूठा लगे. यह तर्क को पलट कर रख देता है, या इससे विरोध करता मालूम होता है, तथा, प्रायः अप्रत्याशित (unexpected) में रसमग्न होता है. कालांतर में थीयटर औफ़ द अब्सर्ड (Theatre of the Absurd) एक ऐसा तकिया कलाम (catch phrase) बन गया जिसको जितना व्यवहार में लाया गया, उतना ही उसके साथ दुर्व्यवहार भी हुआ.

लेकिन आख़िर इसका मतलब क्या है? और हम अब्सर्ड (Absurd) के लेबल को कैसे न्यायोचित या तर्कसंगत ठहरा सकते हैं?


अंग्रेज़ी साहित्य की हर अवधारणा से जुड़ा कोई ना कोई आंदोलन होता है, लेकिन थीयटर औफ़ द अब्सर्ड (Theatre of the Absurd) से जुड़ा कोई आंदोलन या स्कूल (school) नज़र नहीं आता, जो कि अपने आप में ‘absurd’ है. अगर आप इन नाटककारों से पूछें कि वे किस परम्परा से आते हैं, तो शायद ही उनके पास कोई जवाब हो; क्योंकि, वे किसी भी परम्परा या नियम का पालन नहीं कर रहे होते हैं. इन नाटकों में यथार्थवादी चरित्र (realistic character) तथा परिस्थिति (situation) से एक विचलन (departure) होता है. यहाँ “एक्शन” के समय (time) तथा स्थान (place) को लेकर कोई स्पष्ट धारणा नहीं होती है. यहाँ चरित्र अक्सर बेनाम (nameless) होते हैं, और, वे एक निश्चित भूमिका (role) में होने की बजाए, इसका आदान-प्रदान करते दिखायी देते हैं. उदाहरण के लिये, एक आदमी को आप मंच (stage) पर किसी एक ख़ास चरित्र को निभाते देख रहे होते हैं, किंतु, दूसरे ही क्षण, वह किसी दूसरे भिन्न चरित्र में प्रविष्ट (enter) हो जाता है. घटनायें किसी तर्कसंगत प्रेरणा (rational motivation) के नियंत्रण से बाहर होती हैं, और, उनके लक्षण किसी डरावने स्वप्न से होते हैं. संवाद तथा घटनायें दर्शकों को पूरी तरह ऊटपटाँग, बेतुकी, और, यहाँ तक कि, हास्यास्पद भी दिखायी दे सकती हैं. 


आपके दिमाग़ में यह प्रश्न भी कौंध सकता है कि अगर ये नाटक बेतुके (nonsensical) तथा हास्यास्पद (farcical) थे, तो इतने मशहूर कैसे हो गये? 


यह सम्भव है कि उस समय के दर्शक एक पैटर्न की एकरसता (monotony) से ऊब चुके थे, वे ख़ुद को किसी भी प्रकार के नियंत्रण से आज़ाद करना चाहते थे. दर्शक वही बोलना, देखना, और सुनना चाहते थे, जिसकी कल्पना पहले ना की जा सकी हो, और, जिसमें कुछ नयापन हो. 


लेकिन, ये नाटक, अगर गहरी समझ से देखें, तो कहीं से भी बेतुके नहीं थे. इन नाटकों में मानव की स्थिति, अकेलापन (loneliness), अलगाव (isolation), जीवन तथा मृत्यु से सम्बंधित विसंगतियाँ (senselessness of life and death), तथा एक व्यक्ति के अन्य व्यक्तियों, या माहौल के साथ, एक अर्थपूर्ण तरीक़े से जुड़ने में हासिल विफलता उजागर होती है. ये नाटक इन्हीं सारी स्थितियों को प्रस्तुत किया करते थे. इस तरह की कठोर (stark) चीजें व्यंग्यात्मक तथा हास्यपूर्ण तरीक़ों से मंच पर प्रस्तुत की जाती थीं. थीयटर औफ़ द अब्सर्ड (Theatre of Absurd) किसी प्रकार की नैतिकता या सदाचार का संदेश नहीं देता; बल्कि, यह जीवन की आन्तरिक वास्तविकता को उजागर करता है. यहाँ मंच पर कोई बन्धन नहीं होता, कि, किस किरदार को किस तरह से मंच पर दाखिल होना है, या, भूमिका की शुरुआत करनी है; जिसकी वजह से, ये नाटक दर्शकों को विचित्रता से परिपूर्ण लग सकते हैं. लेकिन यह वैचित्र्य के तत्त्व ही हैं, जो कि दर्शक द्वारा, थीयटर औफ़ द अब्सर्ड (Theatre of the Absurd) से अपेक्षित होते हैं. ऐसे नाटकों में आपसी तौर पर कोई समानता नहीं होती, बजाय इस बात के, कि, ये किसी नाटक की परम्परा का अनुसरण करते हुये नहीं पाए जाते हैं. वास्तव में, थीयटर औफ़ द अब्सर्ड, परिस्थितियों का एक रंगमंच है, यह पारम्परिक नाटकों की तरह घटनाक्रमों (sequential events) का रंगमंच नहीं है. 

Absurdist Fiction

यह उस तरह का साहित्य है जो अक्सर उपन्यासों, नाटकों तथा कविताओं में प्रयुक्त होता है, जो चरित्रों की उस दुनिया के अनुभवों पर केन्द्रित होता है, जहाँ, चरित्र या पात्र जीवन के अंतर्निहित उद्देश्यों (inherent purpose) को देख या समझ नहीं पाते. दूसरे अर्थों में, जीवन की व्यर्थता को उजागर करता साहित्य. इस साहित्य के चरित्र जीवन के ही अस्तित्त्व पर ही प्रश्नचिन्ह लगाते दिखते हैं, जिसका प्रस्तुतीकरण अक्सर meaningless actions तथा घटनाओं द्वारा किया जाता है. 


अब्सर्डिस्ट गल्प (Absurdist fiction), अपनी भाषा की आलोचना में, भाषा से सम्बंधित समकालीन दर्शन की व्यस्तताओं या उनके भाषा को सुलझा हुआ बनाने के प्रयासों का मखौल उड़ाता भी प्रतीत होता है. यहाँ शब्दों के द्वारा जिस किसी भी विचार को प्रस्तुत करने की कोशिश की जाती है, उसका परिणाम निरर्थक ही होता है. जब कभी हम संवाद की बात करते हैं, तो अक्सर कहते पाये जाते हैं, कि अर्थ की उत्पत्ति मस्तिष्क में होती है; लेकिन यहाँ वैसा भी कुछ नज़र नहीं आता. यहाँ एक व्यक्ति अपनी बात को पूरी तरह समझाने में हमेशा ही विफल रहता है. यहाँ भाषा का उपयोग भ्रांत (confuse) करने के लिये होता है, और जो प्रस्तुत होता है वह सुसंगत (coherent) नहीं होता. 


जहाँ absurdist fiction क एक बड़ा भाग तर्कहीन (irrational) तथा हास्यास्पद होता है, इसकी कसौटी ना प्रहसन (comedy) है और ना ही बेतुकापन (nonsense); बल्कि, यह उन परिस्थितियों में मानव स्वभाव (human behaviour) का अध्ययन है, जब सबकुछ उद्देश्यहीन (purposeless) तथा विचित्र (absurd) होता है. 


ऐसी कहानियों का संदेश स्पष्ट नहीं होता और ना ही चरित्रों द्वारा किये गये अहसास (realisation) ही स्पष्ट होते हैं. 


दूसरे पारम्परिक गल्पों की तरह absurdist fiction में कोई प्लॉट या संरचना (rising action, climax and falling action etc) नहीं होती. 

Themes

अब्सर्ड साहित्य (Absurd Literature) में सामान्य तौर पर जो प्रसंग (themes) लागू होते थे, वे थे :


Absurdity  — यहाँ चीजें हमारे senses, logic या reasoning को आकर्षित नहीं करतीं. यह अब्सर्डिज़म (absurdism) का सबसे सामान्य विषय-वस्तु (theme) है. यहाँ उस दुनिया की परिस्थितियों को दिखाते हैं जहाँ किसी भी व्यक्ति के लिये कोई तर्कपूर्ण निर्णय लेना असम्भव होता है, और एक व्यक्ति का हर action अर्थहीन तथा व्यर्थ होता है.

Cruelty and Violence — यहाँ तमाशाई हास्य (slapstick humour) की सतहों के नीचे एक तरह की क्रूरता का तत्त्व होता है जो संवादों में परिलक्षित होता है. उदाहरण के तौर पर :

The Room में एक अंधे व्यक्ति को बेरहमी से पीटा जाता है;

The Birthday Party में उल्लास का माहौल पूछ-ताछ (interrogation) तथा अपहरण (abduction) में तब्दील हो जाता है;

The Lesson में एक प्रोफ़ेसर अपने विद्यार्थियों की एक-के-बाद एक क्रूरता से हत्या केवल इसलिए करता है, क्योंकि उसे इस बात से परेशानी होती है, कि उसके विद्यार्थी उसकी कोई बात नहीं समझ पा रहे होते हैं. प्रोफेसर का ‘lesson’ निरर्थक जाता है.


Domination — बहुत सारे absurdist नाटकों में अक्सर दो चरित्रों को आमने-सामने लाकर खड़ा करते हैं, जिसमें एक dominate करता है, और दूसरा dominated होता है. यह एक तरह से बादशाह/स्वामी और ग़ुलाम/सेवक वाला रिश्ता होता है.


Futility and Passivity — व्यर्थता तथा निश्चेष्टता (passivity) भी absurd साहित्य में एक प्रमुख विषय-वस्तु होता है.


Language — अर्थ को सम्प्रेषित करने में भाषा की अक्षमता. भाषा या तो स्थितियों की ऐसी व्याख्या करती दिखती है, जिससे दर्शकों की सहमति नहीं बन पाती, या फिर यह बस बड़-बड़ (gibberish) बनकर रह जाती है. उदाहरण के लिये : Adamov ने अपने नाटक “Ping-Pong” में धार्मिक निष्ठा (religious dedication) की भाषा (pompous language and expressions) का उपयोग किया है, लेकिन यहाँ जिस वस्तु की स्तुति की जा रही है, वह है एक पिन्बॉल मशीन (pinball machine) !


Loneliness and Isolation — यहाँ आधुनिक जीवन में लगातार अकेले होते जा रहे आदमी की परिस्थितियों को बढ़ा-चढ़ा कर दिखाया जाता है. उदाहरण के लिये, एक नाटक में एक पार्टी में पति और पत्नी एक दूसरे को पहचान नहीं पाते.


Materialism — इस प्रसंग (theme) को दर्शाता एक नाटक है American Dream, जहाँ परिवार के सदस्यों के आपसी रिश्ते संवेदनाओं की जगह, हानि-लाभ (profit-loss) के समीकरणों (equations) पर बने होते हैं. एक औरत एक ऐसे व्यक्ति से बस इसलिये शादी करती है, क्योंकि वह अमीर है, लेकिन जज़्बाती तौर पर उससे कभी नहीं मिल पाती, इसलिये एक दिन वे बाज़ार जा कर एक संतान ख़रीद लाते हैं, जो कि आते ही दम तोड़ देती है. जब वे उस बच्चे के लिये रोते हैं, तो उनके दिमाग़ में उस बच्चे पर ख़र्च किये पैसों का ब्योरा चल रहा होता है, ना कि कोई इंसानी भावना. Absurd साहित्य में लेखकों ने ऐसी ही अमानवीय सोंच का मख़ौल उड़ाया है.


इन सबके अलावा Absurd fiction में और भी समान तत्त्व (common elements) होते हैं, जैसे कि: satire, dark humour, strangeness, the abasement of reason, and controversy regarding the philosophical condition of being “nothing.”

Style

हमने पहले इस बात पर चर्चा की थी कि जहाँ absurd की बात होती है वहाँ शैली (style) के मामले में कुछ भी स्थिर नहीं होता. लेकिन, कुछ चीज़ें सामान्य रूप से पायी जा सकती हैं —


Character — absurd में पारम्परिक चरित्र निर्माण (character development) के सिद्धान्तों का अनुसरण नहीं करते हैं. यहाँ ऐसे चरित्र पेश किये जाते हैं जिनकी कोई स्पष्ट पहचान नहीं होती, उनकी भूमिका (roles) interchangeable होते हैं. 


Denouement — Denouement की बात आते ही हम दिमाग़ में शुरुआत तथा अंत का ख़याल लाते हैं, लेकिन अब्सर्ड (absurd) में ऐसी कोई अवधारणा नहीं होती. यहाँ actions की पुनरावृति होती है, जो यह दर्शाती है कि, इस ब्रह्मांड में मन के अनुरूप अंत की अपेक्षा के लिये मानव की तमाम कोशिशें बेकार हैं.


Dialogue — जैसा कि हमने चर्चा की थी कि Absurd में भाषा का उपयोग इसकी व्यर्थता को इंगित करने के लिये किया जाता है, इसलिये यहाँ संवाद का महत्त्वपूर्ण स्थान होता है. यहाँ भाषा कृत्रिम होती है, जिसमें प्रेषित संवादों का कोई अर्थ नहीं होता, और जिसमें बस रूढ़ोक्ती (cliche) तथा नारे (slogans) होते हैं, और इन्हें प्रस्तुत करने का ढंग भी बनावटी होता है. 


Plot — यहाँ सारी परम्पराओं का उल्लंघन होता है. उदाहरण के लिये, Samuel Beckett के नाटक “Waiting for Godot”में कुछ भी नहीं होता. यहाँ चरित्र कुछ भी नहीं करते. इस नाटक की शुरुआती पंक्ति ही यही कहती है, “Nothing to be done.”


Setting — यहाँ setting भी काफ़ी अपरंपरागत (unconventional) होती है. यहाँ मंच काफ़ी खाली-खाली सा होता है, जो कि चरित्रों के जीवन के ख़ालीपन की तरफ़ इशारा करता है. 


तो यहाँ हमने देखा कि अब्सर्ड (Absurd) की अपनी कोई शैली (style) ना होते हुये भी एक शैली (style) है, जो है विचित्रता (bizarre). 

Albert Camus on Absurdity in Life

Albert Camus के द्वारा अब्सर्ड (Absurd) पर एक विस्तृत आलेख लिखा गया है. Albert Camus एक नोबेल पुरस्कार विजेता तथा एक दार्शनिक थे. उन्होंने लिखा है कि यह दुनिया वास्तव में एक व्यक्ति के लिये ना ही अब्सर्ड (absurd) है और ना ही निश्चित. अब्सर्ड (Absurd) वास्तव में दो लोगों या समूहों के बीच समुचित संवाद की कमी है. एक व्यक्ति और उसकी परिस्थितियों के बीच वास्तविक अर्थ को लेकर जद्दोजहद है अब्सर्ड (Absurd). यहाँ ना परिस्थिति मनुष्य को समझ पाती है और ना मनुष्य परिस्थिति को ही. यहाँ रचनाकार तथा रचना के बीच कोई सामंजस्य नहीं बैठ पाता. 


Albert Camus वास्तविक तथा रोज़मर्रा के जीवन से छः उदाहरण लेते हैं :


  1. Feeling of void — ख़ालीपन
  2. Mechanical living — यंत्रवत जीवन

  3. A person becomes aware of time passing and begins to make plans for a better future — लेकिन, यह स्वयं में absurd है, क्योंकि हम आख़िर में समय के चक्र में ही फँसे हुये हैं. अच्छे भविष्य के लिये प्लान बनाने में ही कुछ और समय निकल जाता है. 

  4. When people perceive a familiar object differently because they have a different understanding of it — कहते हैं, संवादों के अर्थ की उत्पत्ति मस्तिष्क में होती है. हर आदमी के मस्तिष्क में उसके परिवेश तथा परिस्थितियों से जन्मा एक फ़िल्टर (समाज, परिवार, शैक्षणिक परिवेश इत्यादि) लगा होता है, और वह अर्थ का अंदाज़ा उसके द्वारा ही लगाता है. 

  5. When we have severe feeling of isolation from our fellow humans — जब एक आदमी परिवार तथा दोस्तों से घिरा होने के बावजूद हक़ीक़त में अकेला होता है.

  6. Death and the emotional response it evokes within us — हम सभी जानते हैं कि हम सब मर्त्य हैं, लेकिन अमरत्व को हासिल करने की चिर मानवीय इच्छा अपने आप में absurd है.

    Conclusion

    Albert Camus, अब्सर्ड साहित्य (Absurd Literature) की चर्चा करते हुये, मनुष्यों से यही सवाल करते हैं कि जब सभी को एक दिन मृत्यु को ही प्राप्त होना है, और सब इस बात को भली-भाँति जानते हैं, तो इतना लालच लोग क्यों रखते हैं, जिसके लिये तो कई व्यक्ति मानव-मूल्यों तक को गिरवी रख देते हैं? और उनके लिये यही मानव जीवन का अब्सर्ड (Absurd) है.

     

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