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Hermeneutics Explained in Hindi

व्याख्याशास्त्र क्या है ? (What is Hermeneutics?)



व्याख्याशास्त्र का इतिहास (History of Hermeneutics)

व्याख्याशास्त्र (Hermeneutics) एक प्रकार से व्याख्या (interpretation) की कला या प्रणालीविज्ञान को कहते हैं.
व्याख्याशास्त्र (Hermeneutics) का एक इतिहास रहा है. ऐसा नहीं है कि यह हमेशा से ही अस्तित्त्व में था या लोगों ने हमेशा से ही इसके बारे में सुनियोजित तरीक़े से सोंच कर रखा था. हममें से कई लोग अरस्तु (Aristotle) के आलेख De Interpretatione के बारे में जानते होंगे. मध्यकालीन युग ऐसे व्याख्या से सम्बंधित आलेखों से भरा पड़ा है. लेकिन, यह शब्द विशेष “व्याख्याशास्त्र (Hermeneutics)” हमेशा से ही अस्तित्त्व में नहीं था, या ही इस विचार का होना; कि, हम किसी भी चीज़ को कैसे व्याख्यायित करते हैं उसे समझ पाने के लिए एक सुव्यवस्थित पाठ्यक्रम होना चाहिए.

व्याख्याशास्त्र (Hermeneutics) का विचार धर्म के क्षेत्र में सबसे पहले आया, विशेष रूप से, क्रिश्चियन परम्परा में; लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उससे पहले शताब्दियों का तलमुडिक (Talmudic) विद्वता का इतिहास नहीं रहा है, मूल रूप से जिसकी प्रकृति व्याख्यशास्त्र (Hermeneutics) की ही रही है. परंतु, पाश्चात्य-सभ्यता में इसके उदय के पीछे जो एक महत्त्वपूर्ण कारण था वह था प्रोटेस्टेंट सुधारवादी आन्दोलन.

यहाँ, यह समझने वाली बात है कि आप व्याख्या (interpretation) के बारे में अपना दिमाग़ तब तक नहीं दौड़ाना चाहेंगे जब तक कि:
 (अ)अर्थ आपके लिए महत्त्वपूर्ण ना हो जाए, या
 (ब) अर्थ की निश्चितता दुरूह ना हो जाए.

लेकिन, क्या अर्थ को समझना हमेशा से ही इतना महत्त्वपूर्ण या कठिन था? अगर आप उस तरह के व्यक्ति हैं, जो पोप (Pope) या चर्च के बुजुर्गों द्वारा यदा-कदा सुनाये जाने वाले धार्मिक-ग्रंथों के बारे में किसी भी प्रकार के आदेश को लेकर कोई शंका या दुविधा नहीं रखते हैं, और आपको बस बता दिया जाता है कि यही इसका अर्थ है, और आप विश्वास कर लेते हैं, तो आपके लिये कोई परेशानी नहीं होगी. लेकिन, प्रॉटेस्टंट सुधारवादी आन्दोलन के समय, जब एक व्यक्ति के बाइबल के साथ व्यक्तिगत सम्बन्ध के मुद्दे को लेकर प्रश्न खड़ा हुआ, और जब यह लगा कि बाइबल को स्थानीय चर्च मिनिस्टर्स की मदद के बिना समझना मुश्किल हो गया है, तब लोग इस प्रथा लेकर चिंतित होने लगे. और चुकि बाइबल एक पवित्र धार्मिक ग्रंथ है, इसके उद्देश्य एवं अर्थ को समझना इस धर्म के अनुयायियों के लिये निहायत महत्त्वपूर्ण हो जाता है. लोग इसे जानने के लिए उत्सुक होते हैं, क्योंकि एक पवित्र धार्मिक ग्रंथ कोई भी उल्टी-सीधी बात नहीं कह सकता.

इसलिए, जैसे-जैसे प्रॉटेस्टंटिज़म बढ़ा, वैसे-वैसे व्याख्यशास्त्र (Hermeneutics) की कला या विज्ञान को बढ़ावा मिला, और लोग व्याख्या (interpretation) के ऊपर आलेख लिखने लगे, लेकिन यह हमेशा बाइबल के ऊपर ही होता था. 
दूसरे शब्दों में, व्याख्यशास्त्र (Hermeneutics) की इस परम्परा में पहले धर्म आया, और उसके बाद, संवैधानिक लोकतंत्र (constitutional democracy) के विकास के साथ लोग एक अधिकारपूर्ण नागरिक (rightful citizen) होने के नाते या फिर एक ऐसे  व्यक्ति होने के नाते जिसके पास मताधिकार (suffrage) है, इसमें ज़्यादा रुचि दिखाने लगे. उन्हें लगने लगा कि जो भी नियम-क़ानून उन्हें चलाते हैं, उनकी असल प्रकृति जानना उनका जन्मसिद्ध अधिकार है. इसलिए, व्याख्याशास्त्र (Hermeneutics) धीरे-धीरे विकसित हुआ, इसने धर्म को पीछे छोड़कर नहीं, अपितु, इससे भी आगे बढ़कर क़ानून के अध्ययन (field of law) के क्षेत्र में अपनी जगह बनायी.

धार्मिक ग्रंथों की व्याख्या (interpretation) के लिए जो कला तथा विज्ञान विकसित हुये, उन्हीं का प्रयोग उन चीजों की व्याख्या (interpretation) के लिए किया जाने लगा, जिनका अर्थ समझना अब धर्म जितना ही महत्त्वपूर्ण हो गया था. जैसे कि, क़ानून क्या है और इसकी व्याख्या कैसे की जानी चाहिए. क़ानून के क्षेत्र में व्याख्याशास्त्र (Hermeneutics) आज भी महत्त्वपूर्ण है. उदाहरण के लिए, आज संविधान को समझने के लिए हमारे पास क्या आधार हैं? हम इसके लिए अलग से एक विषय संविधान की व्याख्या (Interpretation of Constitution) पढ़ते हैं. इससे जुड़े बहुत सारे विवाद भी हैं. क़ानून की पढ़ायी के दौरान इन सारे विवादास्पद मुद्दों की तह तक पहुँचने के लिए विद्यार्थी अलग-अलग अध्ययन-क्षेत्र का चुनाव करते हैं. 
व्याख्याशास्त्र (Hermeneutics) यहाँ उस चरण में पहुँच गया है जहां किसी भी चीज़ का अर्थ ज़्यादा महत्त्वपूर्ण हो जाता है, ख़ासकर वहाँ जहां लोग यह मानते हैं कि अर्थ को समझना आसान नहीं है. 

अभी तक हमने साहित्य की कोई भी बात यहाँ नहीं की है. सच्चाई यह है कि अंग्रेज़ी साहित्य के उत्तर आधुनिक काल (early modern period) के समय तक, तथा लगभग पूरी अट्ठारहवीं सदी के दौरान, साहित्य की दुनिया के लिए किसी व्याख्याशास्त्र (Hermeneutics) की कला या विज्ञान का विकास नहीं हो पाया था. यहाँ, आप अट्ठारहवीं सदी के उन लेखकों के बारे में ज़रा सोंचिए, जिनके बारे में आप अबतक पढ़ते आये हैं. यह काफ़ी रोचक पहलू है कि वे सभी, अर्थों को बिना किसी प्रमाण के सही मान लिया करते थे. उदाहरण के लिए Alexander Pope या Johnson जब साहित्य की प्रकृति के बारे में चिंतन कर रहे होते हैं, उनकी चिंता इसकी व्याख्या (interpretation) को लेकर नहीं बल्कि, इसके मूल्यांकन (evaluation) तथा विभिन्न सिद्धांतों की स्थापना को लेकर होती है. वे मूलतः नैतिक (ethical) तथा सौंदर्य विषयक (aesthetic) प्रश्नों को उठाते हैं. उनकी चिंता व्याख्या को लेकर नहीं होती, क्योंकि, उनके लिए अच्छा लेखन वही है जिसमें अर्थ स्वतः स्पष्ट हों, जिसकी व्याख्या की ज़रूरत ही ना पड़े; तथा, जिसके पास स्वाभाविक रूप से अर्थ की पारदर्शिता हो. 

वास्तव में, इस पूरी अवधि के दौरान नाटककार नाटक के उपक्षेप लिखने में व्यस्त थे; जिनमें, वे दूसरे नाटककारों के लेखन में मौजूद अर्थों की अस्पष्टता को लेकर भर्त्सना में मशगूल रहा करते थे. दूसरे अर्थों में, भर्त्सना के पीछे की मूल वजह थी, व्याख्या की ज़रूरत. उदाहरण के तौर पर, “मुझे नहीं पता कि फ़लाँ नाटककार कैसी लक्षणा (metaphors) का प्रयोग करता है? क्या फ़लाँ नाटककार यह जानता भी है कि रूपक (metaphor) होते क्या हैं ? फ़लाँ नाटककार रूपक के नाम पर बस ग़लतियाँ किए जा रहा है. कोई उस नाटककार की रचनाओं को समझ भी सकता है, क्या?” 

अट्ठारहवीं सदी के दौरान व्याख्या बस साहित्य की पढ़ायी के दायरे से ही बाहर नहीं थी, बल्कि, यह भी समझा जाता था कि साहित्य में जो कुछ भी मूल्य की चीजें हैं, वहाँ व्याख्या के लिए कोई स्थान ही नहीं है. अगर साहित्य की किसी कृति को व्याख्या की ज़रूरत पड़ती है, इसका मतलब, उस साहित्यिक कृति का अपना कोई मूल्य नहीं है. लेकिन, जैसे-जैसे अट्ठारहवीं सदी अपने समापन की ओर बढ़ी, रोमांटिसिज़्म (Romanticism) के उदय के साथ-साथ एक विशिष्ट-व्यक्ति पूजा (cult of genius) का दौर आया, जहां यह माना जाता था कि साहित्यिक कृतियाँ लेखक के असाधारण मानसिक तीक्ष्णता (acuity) तथा आध्यात्मिक अंतर्दृष्टि (spiritual insight) की देन होती हैं; और साहित्य के बारे में जो भी समझने लायक़ है, वह है इसके उत्पादन का वैशिष्ट्य! अच्छी बात है, लेकिन अगर बात यहाँ विशिष्ट-व्यक्ति पूजा (cult of genius) की है, तो आपने शायद समझ ही लिया होगा कि परिणाम क्या होने वाला है …

रोमैंटिसिज़म (Romanticism) के इस दौर में, एक लेखक दैवीय स्थान (divine status) प्राप्त कर चुका है. आपको शायद याद होगा कि पुनर्जागरण (अट्ठारहवीं शताब्दी) के दौरान पाश्चात्य सभ्यता में धर्मनिरपेक्षता (secularism) को बढ़ावा मिला था. किसी एक तरह से रोमांटिसिज़्म (Romanticism) तथा इसके लिए जो भी मुद्दे महत्त्वपूर्ण थे उनसे सम्बद्ध पुस्तकों को नॉर्थ्रप फ़्राई (Northrop Frye) ने धर्मनिरपेक्ष धार्मिक ग्रंथ (Secular Scriptures) कहा है.

दूसरे शब्दों में, साहित्य की दुनिया में, रोमैंटिसिज़म (Romanticism) वह दौर था, जब अर्थ को समझना विशेष रूप से काफ़ी जटिल हो गया, क्योंकि यहाँ लेखन गंभीर तौर पर व्यक्तिनिष्ठ (subjective) हो गया था, तथा अब इसका साझा मूल्यों (shared values) से कोई लेना-देना नहीं था. साहित्य का महत्व या इससे समझना किस प्रकार से निहायत ज़रूरी है इस बात की समझ भी इस दौरान लोगों में विकसित होने लगी थी; क्योंकि, काफ़ी लोगों के लिए साहित्य आंशिक तौर पर धर्म का स्थान ग्रहण करने लगा था. इसलिए धर्मनिरपेक्ष धर्मग्रंथों के उदय के साथ ही, यह समझा जाने लगा कि साहित्य में अर्थ को समझना महत्वपूर्ण है, और साथ ही साथ जटिल भी. 

इसी तरह के माहौल में व्याख्याशास्त्र (Hermeneutics) की कला तथा विज्ञान का साहित्य के क्षेत्र में आगमन हुआ. विशेष रूप से, रोमांटिक काल (Romantic Period) के महान धर्मशास्त्री, फ़्रेड्रिक श्लायमाकर (Friederich Schleiermacher), ने अपनी जीवनयात्रा को व्याख्याशास्त्र (Hermeneutics) के सिद्धांतों को समर्पित किया, जिनका उपयोग जितना धर्मग्रंथों को समझने के लिए किया जाना था, उतना ही साहित्य की समझ के लिए भी. उन्होंने उस परम्परा की स्थापना की, जिसमें यह समझा जाता था कि साहित्य व्याख्याशास्त्र (Hermeneutics) का केंद्रबिंदु है.

विल्हेम डिल्थे (Wilhem Dilthey) ने भी सदी की समाप्ति तक व्याख्याशास्त्र (Hermeneutics) की दिशा में कुछ काम किये. इसके बाद मार्टिन हाइडेगर (Martin Heidegger) ने अपने Being and Time (1927) में, तत्पश्चात् हंस-जॉर्ज गादमर (Hans-George Gadamer) ने, जो कई मायनों में मार्टिन हाइडेगर (Martin Heidegger) के अनुयायी या शिष्य कहे जा सकते हैं — उन्होंने कुछ काम किए. लेकिन, आज भी व्याख्या (interpretation) की जो परम्परा चल रही है, उसके प्रणेता फ़्रेड्रिक श्लायमाकर (Friedrich Schleiermacher) को ही माना जाता है, जिन्होंने रोमांटिक पीरियड (Romantic Period) के दौरान साहित्य के क्षेत्र में काम किये.



व्याख्या चक्र (The Hermeneutics Circle)

अब आप स्वयं से एक प्रश्न पूछें कि अभी तक व्याख्याशास्त्र (Hermeneutics) के जिस परम्परा की हमने चर्चा की है, उसकी कमियाँ क्या हो सकती हैं. इसके लिए पहले हम देखेंगे कि Hermeneutics Circle क्या है. असल में यह पाठक (reader) तथा पाठ (text) के बीच का एक सम्बन्ध है. हंस-जॉर्ज गादमर (Hans-Georg Gadamer) के अलावा व्याख्याशास्त्र (Hermeneutics) की समझ रखने वाले जो दूसरे विद्वान थे, उनके लिए इसका मतलब होता था, एक पाठक (reader) तथा लेखक (author) के बीच का सम्बन्ध, जिसमें एक पाठक का उद्देश्य होता था एक लेखक के प्रयोजन को समझना. एरिक डॉनल्ड हिर्श (Eric Donald Hirsch) इसी परम्परा के थे. यहाँ पाठ एक प्रकार के मध्यस्थता-सम्बन्धी दस्तावेज़ की तरह होता है, जिसमें एक ‘लेखक का अर्थ’ छिपा होता है. लेकिन, हंस-जॉर्ज गादमर (Hans-Georg Gadamer) तथा उनकी परम्परा के लिए यह एक पाठक (reader) तथा पाठ (text) के बीच का सम्बन्ध है. इसे दूसरी तरह से कह सकते हैं कि यह अंशता (a part) तथा पूर्णता (a whole) के बीच का सम्बन्ध है. उदाहरण के लिये, जब हम किसी पाठ पर पहली नज़र डालते हैं, तो सबसे पहले हमारा परिचय किसी एक शब्द, पद या वाक्य से होता है, और हम उस आधार पर अपने दुनियावी अनुभवों की मदद से एक विचार बना लेते हैं, कि फ़लाँ पाठ अपने पूर्ण स्वरूप में हमसे आगे क्या कहने वाला है. आगे हम इसी विचार को लिए हुये बाक़ी पाठ को पढ़ते हैं. लेकिन पाठ के विभिन्न अनुच्छेदों (paragraphs) के साथ-साथ, जैसे-जैसे हम नया ज्ञान अर्जित करते जाते हैं, हम पुराने अनुभवों को पृष्ठभूमि में रखते हुये, नये विचार बनाते चले जाते हैं. यह पिछले अनुभवों के आधार पर पोषित विचार अथवा पूर्वाग्रहों तथा नए ज्ञान के बीच एक पाठक की जो व्याख्यापरक व्यस्तता होती है, इसमें एक चक्रियता (circularity) होती है. इसे हम वर्तमान तथा भूत के बीच के सम्बन्ध के रूप में भी समझ सकते हैं. उदाहरण के लिए, जब हम किसी अन्य ऐतिहासिक कालखंड में लिखे पाठ को पढ़ेंगे, तब इसकी शुरुआत में हमारे पूर्वाग्रह, हमारे वर्तमानकाल के अनुभवों के आधार पर बनेंगे, लेकिन जैसे-जैसे हम पाठ से परिचित होते जाएँगे, हमारे विचार भी बदलते चले जायेंगे. व्याख्याशास्त्र बस इतिहास की खाई को ही नहीं पाटता है, बल्कि यह सामाजिक एवं सांस्कृतिक खाइयों को भी पाटने की क्षमता रखता है.

 जब हम एक दूसरे से वार्तालाप करते हैं, यह भी व्याख्या (interpretation) की ही एक क्रिया है. यहाँ हम पहले किसी दूसरे व्यक्ति के वक्तव्य को समझते हैं, फिर हम जो कहना चाहते हैं उस बात से उस समझ का सम्बन्ध स्थापित करते हैं. हमें अपने वार्तालाप का परिपथ (circuit) खुला रखना होता है, ताकि हम पारस्परिक रूप से समझ सकें कि हम किस विषय को लेकर वार्तालाप कर रहे हैं. हमें यही प्रक्रिया विभिन्न संस्कृतियों के बीच संवाद स्थापित करने के लिए भी दुहरानी होती है. इसलिए, हमें समझना होगा कि व्याख्याशास्त्र (Hermeneutics) अनिवार्य रूप से इतिहास के विभिन्न काल-खंडों का मिलन मात्र नहीं है; अपितु, हंस-जॉर्ज गादमर (Hans-Georg Gadamer) के शब्दों में, यह विभिन्न सांस्कृतिक, सामाजिक एवं अंतर्वैयक्तिक क्षितिजों का भी मिलन-बिंदु है.

आइये देखते हैं कि हंस-जॉर्ज गादमर (Hans-Georg Gadamer) इस विषय में और क्या कहते हैं : 
“वह (पाठक), पाठ (text) के शुरुआत में कुछ अर्थों के उजागर होते ही, अपने सामने पाठ के पूर्ण अर्थ को प्रक्षेपित (project) करता है. यह इसलिए होता है, क्योंकि किसी ख़ास अर्थ को ध्यान में रखते हुये, वह पाठ को किसी अपेक्षा (expectation) के साथ पढ़ रहा होता है. यह fore-project (अपेक्षित अर्थ जो वास्तविक अर्थ से भिन्न होता है) पाठ को पढ़ने के क्रम में उजागर होने वाले नए अर्थों के साथ संवाद कर स्वयं को निरंतर संशोधित करता जाता है; और जो पाठ के अंत में समझ में आता है, वह अर्थ ही पूर्ण होता है.”

वहाँ क्या है (What’s there)?

हंस-जॉर्ज गादमर (Hans-Georg Gadamer) जब die Sache (विषय-वस्तु) के विषय में बात करते हैं, तब यही सवाल पूछ रहे होते हैं. दूसरे शब्दों में, एक पाठक के पाठ के अर्थ के साथ ताल-मेल बैठाने की कोशिश एक तरह से उसकी विषय-वस्तु के ऊपर स्वामित्व हासिल करने का प्रयास है. पाठक जानना चाहता है कि वहाँ आख़िर है क्या (What’s there?). यानि कि, पुस्तक की विषय-वस्तु क्या है. Gadamer जब कहते हैं, “What’s there?,” तब उनका यही आशय होता है. Gadamer यहाँ पठन क्रिया की चक्रियता के विषय में ही बात कर रहे होते हैं.

हमारे दिमाग़ में यह सवाल पैदा हो सकता है कि आख़िर यह fore-structure, fore-project या fore-having है क्या? क्या हम पाठ को वस्तुनिष्ठ (objective) होकर नहीं पढ़ सकते? दूसरे शब्दों में, क्या यह पूर्वाग्रहों से ग्रसित होना नहीं हुआ, अगर हम पाठ की शुरुआत में ही किसी प्रकार की धारणा पाल बैठें? हम क्यों ना इन पूर्वाग्रहों को परे रखकर हम बस वास्तविक अर्थ को समझने की कोशिश करें? क्या हम किसी प्रकार की पूर्व धारणा को मन में रखते हुये किसी पाठ के वास्तविक अर्थ को जान भी सकते हैं? क्योंकि, अगर हम ऐसा करते हैं, तो पाठ का हर परिच्छेद (paragraph) ही एक नयी तरह की पूर्व धारणा को जन्म देगा. इस तरह की सोंच यह इंगित करती है कि हम कभी भी पूर्व धारणाओं से नहीं उबर सकते, और यह काफ़ी विक्षुब्ध करने वाली बात है. Heidegger तथा Gadamer का मानना है कि अगर ऐसी पूर्व धारणायें होती भी हैं तब भी इस चक्र में जाने के दो रास्ते हैं. एक चक्र हमेशा दुष्चक्र (vicious circle) नहीं होता, और इसमें जाने का रास्ता संरचनात्मक (constructive) भी हो सकता है. आप वास्तव में इस चक्र के अंदर छिपे वास्तविक अर्थ का पता लगा सकते हैं. 

अब आप पूछेंगे, “कैसे?”

देखिये; Heidegger कहते हैं, “किसी भी व्याख्या में जिस प्रकार से हम किसी वस्तु (entity) को समझते हैं, उस समझ को हम अन्ततः उस वस्तु से ही तो लेंगे, नहीं तो व्याख्या की प्रक्रिया उस वस्तु को उन धारणाओं के पिंजड़े में क़ैद कर देगी जिसका उससे कोई वास्ता ही नहीं. 

आप फिर पूछेंगे, “जब हमारी लड़ाई यहाँ पूर्व पोषित धारणाओं से है, फिर हम उस वस्तु को वैसे ही कैसे देख सकते हैं?”

यहाँ एक उदाहरण से आपको बातें स्पष्ट हो जायेंगी : 
अट्ठारहवीं सदी में, Mark Akenside नाम के एक कवि ने एक लम्बी कविता लिखी “The Pleasures of the Imagination”. इसी कविता में एक पंक्ति है “The great creator raised his plastic arm.” हम आज उस पंक्ति को पढ़ेंगे तो पूरे विश्वास के साथ यही सोचेंगे कि हो सकता है उस “creater” का वह एक prosthetic limb है जो उसने उठाकर रखा है, और उस पंक्ति का अर्थ वास्तव में यही है. लेकिन, हमें अगर ज़रा भी इस बात का ज्ञान होगा कि जिस ऐतिहासिक फ़लक (horizon), यानि कि अट्ठारहवीं सदी में, Akenside वह कविता लिख रहे होते हैं, उस समय “plastic” का अर्थ होता था “sinuous,” “powerful”, “flexible,” और उस अवस्था में हम तुरत ही समझ जाते हैं कि Akenside क्या कहना चाहते हैं, और हमारे लिये अर्थ साफ़ हो जाता है, और वह अर्थ है — उस महान “creator” ने अपना शक्तिशाली तथा नम्य (flexible) हाथ उठाया.

यही होता है एक अच्छे तथा बुरे पूर्वाग्रह के बीच का अंतर. अच्छा पूर्वाग्रह वह होता है जहाँ हमारे ज्ञान चक्षु खुले और विस्तृत होते हैं. यहाँ हमें पहले से ही पता होता है कि अट्ठारहवीं सदी में “प्लास्टिक” शब्द का मतलब कुछ और होता था जो आज के उसके अर्थ से सर्वथा भिन्न था. हम उसी अच्छे पूर्वाग्रह का इस्तेमाल उस पंक्ति की व्याख्या में करते हैं. Heidegger तथा Gadamer के अनुसार व्याख्या चक्र के अंदर जाकर अर्थरूपी मोती निकालकर लाने का यह एक रचनात्मक तरीक़ा है. 
फिर बुरा पूर्वाग्रह क्या है?
बुरा पूर्वाग्रह वह होता है जहाँ हम बिना किसी अन्वेषण के सीधे-सीधे निष्कर्ष पर पहुँच जाते हैं. हम एक क्षण के लिये भी रुककर यह नहीं सोंचते कि उस शब्द से सम्बन्धित एक दूसरा ऐतिहासिक फ़लक (horizon) भी हो सकता है, जहाँ “प्लास्टिक” का कोई और अर्थ भी होता होगा. उस अवस्था में हम उस अर्थ को लेकर विचलित भी होते हैं क्योंकि वह हमें तर्कसंगत (reasonable) नहीं लगता. 

अब शायद आपको समझ में आ गया होगा कि एक उपयोगी पूर्वाग्रह तथा एक व्यर्थ के पूर्वाग्रह के बीच क्या बड़ा अंतर होता है और इसका व्याख्या की प्रक्रिया पर क्या असर होता है. 


अच्छा तथा बुरा पूर्वाग्रह (Good and Bad Prejudice)

जैसा कि आप Gadamer की पुस्तक Truth and Method (Warheit and Methode) को पढ़ कर समझ सकते है जिसमें एक अंतर्निहित संकेत (implicit suggestion) है कि सच तथा प्रक्रिया की बीच एक अंतर होता है. Gadamer का दूसरे लोगों के व्याख्या के तरीक़े को लेकर एक विरोध (objection) यह है कि वे यह सोंचते हैं कि व्याख्या की एक प्रक्रिया होती है. और जिस मूल प्रक्रिया पर Gadamer प्रहार कर रहे हैं वह है इतिहासवाद (historicism). यह हममें से कुछ लोगों के लिये पेंचीदा (tricky) हो सकता है, क्योंकि, हम आगे New Historicism के सिद्धान्त के बारे में भी पढ़ेंगे, जिसका उस इतिहासवाद (historicism) से कोई भी लेना-देना नहीं है, जिसपर Gadamer यहाँ प्रहार कर रहे हैं. Gadamer का यहाँ इतिहासवाद से मतलब है कि; यह विश्वास, कि आप अपने पूर्वाग्रहों को टाल सकते हैं, या अपनी वस्तुनिष्ठता (objectivity) को पूर्ण रूप से पृथक्क (separate) कर सकते हैं, ताकि आप किसी और काल या जगह या मस्तिष्क की वास्तविकता में प्रवेश कर सकें, यही इतिहासीकरण (historizing) का उद्देश्य होता है. Gadamer कहते हैं कि आप यह कर ही नहीं सकते. आप अपने पूर्वाग्रहों को पूरी तरह दरकिनार नहीं कर सकते, और इसलिये आप इतिहासिकरण के उद्देश्य को भी पूरा नहीं कर सकते. लेकिन, आप स्वयं के बारे में इतना तो समझ सकते हैं कि आप अपनी चेतन अवस्था में किसी एक ख़ास फ़लक के अंदर रहकर सोंचते हैं, और जब आपक आमना-सामना किसी दूसरे फ़लक (horizon) से होता है तो आपको एक पुल (bridge) बनाने की ज़रूरत होती है, ना कि सीधा-सीधा निष्कर्ष पर छलाँग मारने की. आपको बीचोंबीच की एक ज़मीन तलाशनी होती है, जिससे आप पता कर सकें कि भूत को वर्तमान के साथ जोड़ने की क्या-क्या संभावनायें हो सकती हैं. इस प्रक्रिया को गादमर Horizontverschmelzung का नाम देते हैं, जिसका मतलब होता है क्षितिज़ो को मिलाने वाला (horizon merger).

क्षितिज मिलन (Horizon merger) की प्रक्रिया गादमर के अनुसार “effective history” को जन्म देती है. और यहाँ effective history का मतलब है वैसा इतिहास जो उपयोगी हो. वैसा इतिहास जो हमारे लिये काम करे, ना कि वो जो कि संग्रहालयों में छिपा बैठा रहे, हमसे दूर भागे, या हमारी अतीत से दूरियों को और बढ़ा दे. यहाँ ऐसा प्रतीत होता है कि गादमर कहना चाहते हैं कि इतिहासवाद में बहुत कुछ अनैतिक है. ऐसा क्यों है? ऐसा इसलिये है क्योंकि यहाँ इतिहास को एक नीची नज़र से देखा जाता है, जहाँ कि इतिहास बस सूचनाओं का संग्रह भर है. इतिहासवाद हमें कभी भी यह नहीं सूझाता कि अगर हम स्वयं को इतिहास के उन क्षणों से बाँधेंगे तो इतिहास शायद हमसे वही बात कहेगा जो कि इसे कहना चाहिए, और इस तरह यह हमें सच में कुछ सिखा सकेगा. 

अब आप में से कोई यहाँ खड़े होकर अड़ भी सकता है कि, “आप मुझे अपने जैसे औसत मेधा वाले लोगों के बीच ना रखें, मैं तो अलग विलक्षण प्रतिभा का इंसान हूँ, जो कि अपने पूर्वाग्रहों को अपने से पूरी तरह से पृथक्क करके वस्तुनिष्ठ होने की क्षमता रखता है. इसलिये मैं इतिहास को पूरा का पूरा वास्तविक अर्थों में समझ सकता हूँ.” 
उनके लिये यहाँ Heidegger कुछ बोलने वाले हैं —

“ऐतिहासिकता” में इतिहासवाद (Historicism in “Historicity”)

Heidegger ने अपने Being of Time में hermeneutic circle का विश्लेषण करते हुये कहा है, कि, जो वस्तु हमारे सबसे क़रीब होती है, उसमें व्याख्या (interpretation) की एक संरचना अंतर्निहित होती है, और वह इतनी मौलिक होती है कि हम उस वस्तु के बारे में उसके बाहर का कुछ नहीं सोंच सकते. यह कहना कि आप कुछ देख रहे हैं और आप किसी वस्तु को किस प्रकार से देख रहे हैं (seeing something, and, seeng “as” something) दोनों में एक अंतर है. उदाहरण के तौर पर; मान लीजिये, कि आप किसी जगह खड़े कुछ देखने की कोशिश कर रहे हैं, और आपको लिखा दिखता है “Exit”, आप तुरत समझ जाते है कि वहाँ निकलने का एक रास्ता है. अब आप कहेंगे कि आप इस पूरी प्रक्रिया में कोई व्याख्या नहीं कर रहे, या कोई पूर्वानुमान नहीं लगा रहे, और इस प्रकार आप पूरी तरह से वस्तुनिष्ठ (objective) हो रहे हैं. लेकिन, Heidegger कहते हैं कि यह आपका भ्रम है. आपको कैसे पता कि वह एक साइन्बॉर्ड है जिसपर “Exit” लिखा है? देखना आपको एक सहज प्रक्रिया लग सकती है, लेकिन इसमें ना जाने कितने ही प्रकार के पूर्वाग्रह समाहित हैं. Heidegger कहते हैं कि यह पूरी तरह से असंभव है कि आप पूरी तरह से पूर्वाग्रहों से मुक्त हों पायें. हम किसी भी वस्तु को जब देखते हैं उसके विषय में हमें पहले से ही पता होता है, उस समय कोई सक्रिय चेतना काम नहीं करती. उल्टा यह सोचना ज़्यादा मुश्किल है कि जो आप देख रहे हैं, वह असल में एक साइन्बोर्ड नहीं है, और जो लिखा है, वह “Exit” नहीं, कुछ और है. Heidegger कहते हैं कि आपके लिये यह कल्पना करना काफ़ी रोचक रहेगा, कि क्या यह भी संभव हो सकता है, जहाँ हम किसी वस्तु को बस देखें, लेकिन उस वस्तु की तरह नहीं देखें? हम हमेशा किसी वस्तु को किसी रूप में पहले से जानते हैं, और यह व्याख्या की एक प्रक्रिया है जो कि पूर्व ज्ञान से व्युत्पन्न (derived) होती है. यह एक विशुद्ध व्युत्पन्न बौद्धिक क्रिया (derived intellectual act) है और यहाँ कुछ भी मौलिक या प्रारम्भिक (primordial) नहीं है.
लेकिन, इसका मतलब यह कदापि नहीं है कि आपके पूर्वाग्रह हमेशा सही होते हैं, यहाँ बस यही समझना है कि हम इस तथ्य (fact) से नहीं भाग सकते कि मस्तिष्क की पहली (दूसरी या आख़िरी नहीं) प्रवृत्ति ही व्याख्यापरक होती है. हम हमेशा ही किसी वस्तु को ‘किसी वस्तु की तरह’ देखते हैं और यह व्याख्या की ही एक क्रिया है. इस प्रकार किसी भी वस्तु या परिस्थिति को समझना तो सरल है; परन्तु, उसे ना समझना ज़्यादा कठिन कार्य है. इसका इस बात से कोई लेना-देना नहीं है कि वह समझ कितनी ग़लत या सही है. समझ एक पिंजड़ा है, एक क़ैद है. Heideggar कहते हैं कि कितना ही अच्छा हो अगर हमें कुछ समझना ना पड़े, और हम किसी भी वस्तु को किसी ‘वस्तु की तरह’ ना देखें. Heideggar कहते हैं कि सोंच के ऐसे क्षण को पाना अगर असम्भव नहीं, फिर भी काफ़ी कठिन है. इसलिये, Heidegger कहते हैं कि हमें एक व्याख्याकार (interpreter) के तौर पर पूर्वधारणा (preconceptions) तथा पूर्व समझ (fore-understanding) के साथ काम करना चाहिये.

लेकिन पूर्वाग्रह (prejudice) शब्द का क्या करें जो कि अपने आप में एक समस्यात्मक (problematic) शब्द है? 

Gadamer इसको लेकर थोड़े क्षमाशील (apologetic) हो जाते हैं और वे इसके लिये उचित व्युत्पत्ति-विज्ञान (appropriate etymologies) की तलाश में लग जाते हैं, और इसे वे पूर्वनिर्णय (prejudgement) या प्राथमिक निर्णय (prior judgement) के रूप में प्रस्तुत करते हैं, जिसे क़ानूनी अदालतों (court of law) में निर्णय (verdict) देते समय इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. Gadamer के लिये ये कोई अशिष्ट पूर्वाग्रह (vulgar prejudice) नहीं है, बल्कि, इसे हम पूर्वाग्रह के विरुद्ध पूर्वाग्रह (prejudice against prejudice) कह सकते हैं. वे सोंचते हैं कि हम इसे अपनाकर अपनी सोंच को निष्पक्ष (objective) बना सकते हैं. लेकिन…. फिर भी, पूर्वाग्रह (prejudice) तो अच्छी चीज़ नहीं होतीं? हमें पता है कि ये सही नहीं है! हमें पाता है कि इतिहास तथा मानव समाज में इस शब्द ने क्या कारनामे दिखलाये हैं. फिर हम इसका समर्थन कैसे कर सकते हैं? यह करना काफ़ी समस्यात्मक (problematic) होगा.

Gadamer जो कुछ अपने निबन्ध में यहाँ कर रहे हैं, वह वास्तव में एक सक्रिय बौद्धिक अपरिवर्तनवाद (active intellectual conservatism) है. हमें यह स्वीकार करना होगा. उनके निबन्ध का वह पूरा खण्ड (section) जहाँ वे क्लासिसिज़्म (classicism) की बात करते हैं, उसे पढ़कर आप कहेंगे कि क्या ये विषयांतर (digression) नहीं है? आख़िर वे क्लासिसिज़्म में क्यों इतनी रुचि दिखा रहे हैं? उस निबन्ध के इस पूरे खण्ड में वे क्लासिसिज़्म की बात करते हैं और बाद में वे उसे परम्परा (tradition) की संज्ञा देते हैं. उनके कहने क मतलब यह है कि हम क्षितिजों (horizons) को प्रभावी ढंग से (effectively) मिला नहीं सकते, जब तक कि जो भी हम पढ़ रहे हैं, उसके साथ, हमारे पास काफ़ी विस्तृत (broad) तथा व्यापक (extensive) समान पृष्ठभूमि (common ground) ना हो.

Gadamer के लिये क्लासिसिज़्म या जिसे वे बाद में परम्परा कहते हैं उसके बारे में विशिष्ट बात यह है कि यह वह चीज़ है जिसे हम आपस में बाँट सकते हैं. वे तर्क करते हैं कि क्लासिसिज़्म केवल अपने ऐतिहासिक क्षण से ही संवाद स्थापित नहीं करता बल्कि यह कालजयी या अमर होता है, तथा, यह हम सभी से विभिन्न स्तरों पर संवाद स्थापित कर सकता है. इस तरह से यह अपने सत्य बोलने के दावे को निवेदित (proffer) करता है. अच्छी बात है…. इस तरह से आप वास्तव में एक बौद्धिक अपरिवर्तनवादी मानदंडों (intellectually conservative canon) पर खरे उतरते हैं. हो सकता है कि व्याख्याशास्त्र (hermeneutics) के दूसरे सिद्धान्त नवाचार (innovation) या नयापन (novelty) या मतभेद (difference) पर ज़्यादा ध्यान दें. लेकिन हमें संदेह है कि जहाँ तक किसी पाठ को लेकर लोगों कि समझ का सवाल है वहाँ एक समान पृष्ठभूमि या मतैक्य (common ground) का मसला तो है. सब ठीक है… लेकिन क्या यही वह स्थिति नहीं है, जहाँ पूर्वाग्रह का बुरा स्वरूप भी सामने आता है? उदाहरण के लिये Godamer की परंपरा के ही कई महान व्यक्तियों ने किसी समय दास-प्रथा (slavery) को पूरी तरह से यथोचित (appropriate) तथा स्वाभाविक (natural) ठहराया था, वही परम्परा, जिसे Godamer क्लासिकल या क्लासिकल ऐंटिक्वटी (classical antiquity) कहते हैं.

कई आधुनिक विद्वानों ने भी कभी दास-प्रथा (slavery) को लेकर प्रश्न नहीं किया है. दास-प्रथा शास्त्रीय संस्कृति (classical culture) का एक पहलू था जिसके अपने बचाव थे. Gadamer इसके बारे में स्वाभाविक तौर पर बात नहीं करते, लेकिन यह पूर्वाग्रह (prejudice) का ही एक पहलू है जिसे हम परम्परा से जोड़कर देख सकते हैं. इस स्थिति में अगर कोई आगे बढ़कर आलोचना की हिम्मत ना रखे तो यह आपसी समझ (sharing) ख़तरनाक भी हो सकती है. Godamer के व्याख्यात्मक योजना (hermeneutic project) में यही एक जोखिम है. इसका क़तई यह मतलब नहीं है कि Gadamer दास-प्रथा या ऐसी ही किसी और प्रथा के पक्षधर थे.

अगर हम व्याख्याशास्त्र (hermeneutics) को सीधी तौर पर समझें तो इसका मतलब पूर्वानुमान (preconception) होगा, जिससे कि बचा नहीं जा सकता, और हम दार्शनिक तौर पर (philosophically) इसे समझ सकते हैं, लेकिन, फिर भी, यह बुरा रूप भी ले सकता है. इसलिये, अगर हम Gadamer की इस व्याख्या से सहमत होते हैं तो हमें मान कर चलना होगा कि हम पूर्वाग्रहों के साथ जीने के लिये बाध्य हैं. इसलिये, यह तकलीफ़देह है, और यह और भी कई कारणों से कष्टकर है.



एरिक डॉनल्ड हिर्श (ED Hirsch)

ED Hirsh को हम सभी इंग्लिश डिक्शनेरी के ऑथर के रूप में जानते हैं. ये, जब साहित्यिक सिद्धान्त (literary theory) फलफूल (flourished) रहे थे, उस समय के बौद्धिक अधिकारों (intellectual right) के समर्थक (champion) माने जाते थे. लेकिन कम ही लोग यह जानते होंगे कि ये व्याख्याशास्त्र (hermeneutics) को लेकर भी काफ़ी गम्भीर थे और Gadamer के साथ व्याख्याशास्त्र (hermeneutics) के सिद्धान्तों को लेकर आजीवन इनकी आपसी प्रतिस्पर्धा रही. दोनों के विचारों का आज आपसी मेल कराना लगभग एक असम्भव कार्य प्रतीत होता है. Gadamer तथा ED Hirsh, दोनो ही, आज व्याख्या (interpretation) में रुचि रखने वाले लोगों के लिये एक विकल्प (choice) प्रस्तुत करते नज़र आते हैं. 

उदाहरण के लिये, Gadamer अपने इस निबन्ध में इतिहासवाद (historicism) पर प्रहार करते हुये कहते हैं, कि, कोई पाठ जिसे इतिहास के चश्मे से समझा जाता है वह सत्य होने का दावा नहीं कर सकता. हमें लगता है कि हम ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में भूतकाल (past) को समझ पा रहे हैं. हम अपने आप को उस स्थिति में रखकर उस ऐतिहासिक फ़लक (historical horizon) का पुनर्निर्माण करते हैं. यही बात सांस्कृतिक संवाद (cultural conversation) पर भी लागू होती है. उदाहरण के लिये किसी एक संस्कृति में भोजन के पश्चात डकार लेना मेज़बान के लिये एक अभिवादन (compliment) हो सकता है, और अगर हमें इसका ज्ञान होता है तो हम स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर सकते हैं. लेकिन, यह ज्ञान हमारे लिये बस एक फ़ैक्टॉइड (factoid) होगा, और इसका यह मतलब बिल्कुल भी नहीं है कि हम उस तथ्य के साथ सामंजस्य बैठा रहे हैं. यह कोई संवाद (dialogue) की स्थिति नहीं है. यह केवल अन्यत्व (otherness) का इतिहासीकरण (historicise) करने जैसा है, जहाँ, बस किसी भी प्रकार से हम कोई सूचना ग्रहण करने को उतावले रहते हैं. इसलिये, यह केवल भूत (past) का ही प्रश्न नहीं है, बल्कि, यह सांस्कृतिक संवाद का भी प्रश्न है.

इस प्रकार, अन्य (other) के अन्यत्व (otherness) की स्वीकार्यता उसे सिर्फ़ एक वस्तुनिष्ठ ज्ञान (objective knowledge) की वस्तु (object) बना देती है, जहाँ सत्य को जान पाने का दावा मौलिक तौर पर suspend हो जाता है. इसलिये, जब भी हम निष्पक्षता (objectivity) के विचार को पालते हैं तो हम सत्य को जानने के दावे को खो देते हैं. यहाँ हम वस्तु (object) या अन्यत्व (otherness) से सीखने की सम्भावना का परित्याग करके बस उसे जानने को लेकर उत्सुक होते हैं. यहाँ, हम यह नहीं जानना चाहते कि वह वस्तु अपने आप में या अपने लिये क्या है. हम उस वस्तु को अपने लिये नहीं बोलने देते.

Hirsch, Kant का आह्वान (invoke) करते हुये कहते हैं, कि, Kant ने कहा है कि किसी भी नैतिक क्रिया (moral action) का आधार (foundation) यह है कि आदमी को एक आदमी के तौर पर ही देखा जाये ना कि किसी और आदमी के लिये एक औज़ार (instrument) के तौर पर. दूसरे शब्दों में हम अपने आप में एक लक्ष्य हैं ना कि कोई साधन, जब तक कि कोई और हमारा शोषण या औज़ारिकरण (instrumentalisation) नहीं करता. Hirsch यहाँ Kant के इस मानदंड (stand) का पक्ष ले रहे होते हैं. यह विचार कि आप को इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि आप किसी वस्तु (entity) को उसके वास्तविक स्वरूप में जानने के इच्छुक नहीं है, उस वस्तु (entity) का औज़ारिकरण (instrumentalisation) करने जैसा ही है. दूसरे शब्दों में, यह उस वस्तु (entity) को अपने लिये इस्तेमाल करने जैसा है. यह वैसी ही स्थिति है, जब कोई आपसे कुछ कहना चाह रहा है, लेकिन, आप जवाब में नहीं-नहीं चीखते हुये अपने दोनों कानों को बंद कर लेते हैं. यहाँ आप उस दूसरे व्यक्ति को बस अपने लिये इस्तेमाल (appropriate) कर रहे होते हैं.

यही बात आदमी द्वारा बोले गये शब्दों पर भी लागू हो सकती है, क्योंकि, एक सामाजिक परिवेश (social domain) में बोली एक व्यक्ति का विस्तार (extension) तथा अभिव्यक्ति (expression) ही है. यह बात उस स्थिति में भी लागू होती है जब हम किसी आदमी के आशय (intention) को उसके शब्दों के साथ मिला नहीं पाते हैं; और इस प्रकार, हम भाषा (speech) की आत्मा को खो देते हैं, जिसका उद्देश्य होता है अर्थ को संप्रेषित (convey) करना तथा यह समझना कि क्या संप्रेषित (convey) किया जाना है. Gadamer तथा Hirsch के इस वैचारिक टकराव (conflict) में हम खुद को एक चौराहे पर पाते हैं जहाँ हमें यह पता नहीं चलता कि किस दिशा में जाना सही होगा, क्योंकि, हमें सभी रास्ते सही नज़र आते हैं. लेकिन, एक चीज़ यहाँ ध्यान देने योग्य है कि Hirsch यहाँ सत्य को लेकर कुछ नहीं बोल रहे. Right? वे केवल अर्थ (meaning) के बारे में बातें कर रहे हैं, जो कि, अच्छी बात है. वे सही अर्थ तक पहुँचने की जद्दोजहद को ज़्यादा तरजीह देते दिखायी देते हैं. लेकिन, यह भी बड़ा मुद्दा है कि वे सत्य के बारे में बात नहीं कर रहे, जिसका ज़िक्र Gadamer बार-बार अपने निबन्ध में करते हैं. जहाँ Hirsch के लिये अर्थ (meaning) महत्त्वपूर्ण है वहीं Gadamer के लिये अर्थ का सत्य होना महत्वपूर्ण है. दोनों के अर्थों में यही एक विशेष अन्तर है. Gadamer पूर्वानुमान कि अनिवार्यता के अपने विचार को लेकर त्याग करने के लिये तैयार हैं. वे किसी भी ऐतिहासिक या सांस्कृतिक ठोस अर्थ (exactitude of meaning) का परित्याग करने के लिये तैयार हैं. वे यह स्वीकार करने के लिये तैयार हैं कि हमेशा ही हमारी अपनी व्याख्याओं (interpretations) में ‘हम’ मौजूद होते हैं. लेकिन यह ‘हम’ अच्छी चीज़ है अगर हम अन्यत्व (otherness) के फ़लक (horizon) को लेकर सजग होते हैं. यानि कि जहाँ प्लास्टिक का मतलब बस पॉलिमर नहीं होता.

Hirsch का मानना है कि हमारी व्याख्याओं में ‘हम’ बिल्कुल भी नहीं होते, और इसलिये, हम सही रूप से तथा निष्पक्ष भाव से किसी अन्य (other) का अर्थ समझ सकते हैं. इस तरह से हम अर्थ को सही-सही जानकर उस अन्य (other) का सम्मान करते हैं. लेकिन, यहाँ ध्यान देने वाली बात है कि यहाँ अर्थ को सत्य का सहारा नहीं मिल रहा है. ऐसा प्रतीत होता है कि Hirsch के लिये यह मुद्दा नहीं है कि वह अन्य (other) सत्य बोलता है या नहीं. लेकिन, उन्हें पढ़ने पर लगेगा कि ऐसा नहीं है. जो ध्यान देने योग्य बात है, वह यह है, कि, यह उनके द्वारा यहाँ ली गयी दार्शनिक स्थिति (philosophical position) में अंतर्निहित (implicit) नहीं है. Hirsch की यह दार्शनिक स्थिति (philosophical position) यहाँ सत्य का त्याग करती हुयी नज़र आती है. वहीं Gadamer की महानता इस बात को लेकर है कि वे अपने सिद्धान्त में सत्य की खोज को लेकर प्रतिबद्ध थे. यानि कि, उनके अनुसार, अर्थ (meaning), अर्थ की खोज (arriving at meaning) तथा सत्य की खोज के बीच एक घनिष्ठ सम्बन्ध है. Gadamer तथा Hirsch में यही मूलभूत अन्तर है जो किसी भी प्रकार के समझौते से परे (irreconcilable) लगता है, और यहीं हमारे लिये विकल्प (choice) का सवाल भी खड़ा होता है.

अगले लेख में हम configurative reading के सन्दर्भ में Godamer तथा Hirsch पर एक बार फिर चर्चा करेंगे, साथ ही हम Iser की भी चर्चा करेंगे.



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